नैतिक कहानियाँ

                                      श्री गजराज

ये बाल नैतिक कहानियाँ श्री गजराज जी प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक केंद्रीय विद्यालय प्रथम पाली लखीमपुर – खीरी द्वारा बच्चों  के नैतिक विकास हेतु विश्व के समस्त बच्चों को समर्पित है. पुस्तकालय ब्लॉग सदैव उनका आभारी रहेगा .

नैतिक कथा : जीवन का मूल्य

यह कहानी पुराने समय की है। एक दिन एक आदमी गुरु के पास गया और उनसे कहा, ‘बताइए गुरुजी, जीवन का मूल्य क्या है?’
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गुरु ने उसे एक पत्थर दिया और कहा, ‘जा और इस पत्थर का मूल्य पता करके आ, लेकिन ध्यान रखना पत्थर को बेचना नहीं है।’
वह आदमी पत्थर को बाजार में एक संतरे वाले के पास लेकर गया और संतरे वाले को दिखाया और बोला, ‘बता इसकी कीमत क्या है?’
संतरे वाला चमकीले पत्थर को देखकर बोला, ’12 संतरे ले जा और इसे मुझे दे जा।’
वह आदमी संतरे वाले से बोला, ‘गुरु ने कहा है, इसे बेचना नहीं है।’
और आगे वह एक सब्जी वाले के पास गया और उसे पत्थर दिखाया। सब्जी वाले ने उस चमकीले पत्थर को देखा और कहा, ‘एक बोरी आलू ले जा और इस पत्थर को मेरे पास छोड़ जा।’

उस आदमी ने कहा, ‘मुझे इसे बेचना नहीं है, मेरे गुरु ने मना किया है।

आगे एक सोना बेचने वाले सुनार के पास वह गया और उसे पत्थरदिखाया।
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सुनार उस चमकीले पत्थर को देखकर बोला, ’50 लाख में बेच दे’।

उसने मना कर दिया तो सुनार बोला, ‘2 करोड़ में दे दे या बता इसकी कीमत जो मांगेगा, वह दूंगा तुझे…।’
उस आदमी ने सुनार से कहा, ‘मेरे गुरु ने इसे बेचने से मना किया है।’
आगे हीरे बेचने वाले एक जौहरी के पास वह गया और उसे पत्थर दिखाया।
जौहरी ने जब उस बेशकीमती रुबी को देखा तो पहले उसने रुबी के पास एक लाल कपड़ा बिछाया, फिर उस बेशकीमती रुबी की परिक्रमा लगाई, माथा टेका, फिर जौहरी बोला, ‘कहां से लाया है ये बेशकीमती रुबी? सारी कायनात, सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती। ये तो बेशकीमती है।’
वह आदमी हैरान-परेशान होकर सीधे गुरु के पास गया और अपनी आपबीती बताई और बोला, ‘अब बताओ गुरुजी, मानवीय जीवन का मूल्य क्या है?’

गुरु बोले, ‘तूने पहले पत्थर को संतरे वाले को दिखाया, उसने इसकी कीमत 12 संतरे बताई। आगे सब्जी वाले के पास गया, उसने इसकी कीमत 1 बोरी आलू बताई। आगे सुनार ने 2 करोड़ बताई और जौहरी ने इसे बेशकीमती बताया।  अब ऐसे ही तेरा मानवीय मूल्य है। इसे तू 12 संतरे में बेच दे या 1 बोरी आलू में या 2 करोड़ में या फिर इसे बेशकीमती बना ले, ये तेरी सोच पर निर्भर है कि तू जीवन को किस नजर से देखता है।’

सीख : हमें कभी भी अपनी सोच का दायरा कम नहीं होने देना चाहिए।                                धूर्त भेड़िया

ब्रह्मारण्य नामक एक बन था। उसमें कर्पूरतिलक नाम का एक बलशाली हाथी रहता था।देह में और शक्ति में सबसे बड़ा होने से बन में उसका बहुत रौब था। उसे देख सारे बाकी पशु प्राणी उससे दूर ही रहते थे।जब भी कर्पूरतिलक भूखा होता तो अपनी सूँड़ से पेड़की टहनी आराम से तोड़ता और पत्ते मज़े में खा लेता। तालाब के पास जा कर पानी पीता और पानी में बैठा रहता। एक तरह से वह उस वन का राजा ही था। कहे बिना सब पर उसका रौब था। वैसे ना वह किसी को परेशान करता था ना किसी के काम में दखल देता था फिर भी कुछ जानवर उससे जलते थे।जंगल के भेड़ियों को यह बातअच्छी नहीं लगती थी। उन सब ने मिलकर सोचा, “किसी तरह इस हाथी को सबक सिखाना चाहिये और इसे अपने रास्ते से हटा देना चाहिये। उसका इतना बड़ा शरीर है, उसे मार कर उसका मांस भी हम काफी दिनोंतक खा सकते हैं। लेकिन इतने बड़े हाथी को मारना कोई बच्चों का खेल नहीं। किसमें है यह हिम्मत जो इस हाथी को मार सके?”
उनमें से एक भेड़िया अपनी गर्दन ऊँची करके कहने लगा,”उससे लड़ाई करके तो मैं उसे नहीं मार सकता लेकिन मेरी बुद्धिमत्ता से मैं उसे जरूर मारने में कामयाब हो सकता हूँ।” जब यह बात बाकी भेड़ियों ने सुनी तो सब खुश हो गये। और सबने उसे अपनी करामत दिखाने की इज़ाज़त दे दी। 
     चतुर भेड़िया हाथी कर्पूरतिलक के पास गया और उसे प्रणाम किया। “प्रणाम! आपकी कृपा हम पर सदा बनाए रखिये।”कर्पूरतिलक ने पूछा, “कौन हो भाई तुम? कहाँ से आये हो? मैं तो तुम्हें नहीं जानता। मेरे पास किस काम सेआये हो?”
“महाराज! मैं एक भेड़िया हूँ। मुझे जंगल के सारे प्राणियों ने आपके पास भेजा है। जंगल का राजा ही सबकी

                                धूर्त भेड़िया-baal kahani 

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ब्रह्मारण्य नामक एक बन था। उसमें कर्पूरतिलक नाम का एक बलशाली हाथी रहता था।देह में और शक्ति में सबसे बड़ा होने से बन में उसका बहुत रौब था। उसे देख सारे बाकी पशु प्राणी उससे दूर ही रहते थे।जब भी कर्पूरतिलक भूखा होता तो अपनी सूँड़ से पेड़की टहनी आराम से तोड़ता और पत्ते मज़े में खा लेता। तालाब के पास जा कर पानी पीता और पानी में बैठा रहता। एक तरह से वह उस वन का राजा ही था। कहे बिना सब पर उसका रौब था। वैसे ना वह किसी को परेशान करता था ना किसी के काम में दखल देता था फिर भी कुछ जानवर उससे जलते थे।जंगल के भेड़ियों को यह बातअच्छी नहीं लगती थी। उन सब ने मिलकर सोचा, “किसी तरह इस हाथी को सबक सिखाना चाहिये और इसे अपने रास्ते से हटा देना चाहिये। उसका इतना बड़ा शरीर है, उसे मार कर उसका मांस भी हम काफी दिनोंतक खा सकते हैं। लेकिन इतने बड़े हाथी को मारना कोई बच्चों का खेल नहीं। किसमें है यह हिम्मत जो इस हाथी को मार सके?”
उनमें से एक भेड़िया अपनी गर्दन ऊँची करके कहने लगा,”उससे लड़ाई करके तो मैं उसे नहीं मार सकता लेकिन मेरी बुद्धिमत्ता से मैं उसे जरूर मारने में कामयाब हो सकता हूँ।” जब यह बात बाकी भेड़ियों ने सुनी तो सब खुश हो गये। और सबने उसे अपनी करामत दिखाने की इज़ाज़त दे दी। 
     चतुर भेड़िया हाथी कर्पूरतिलक के पास गया और उसे प्रणाम किया। “प्रणाम! आपकी कृपा हम पर सदा बनाए रखिये।”कर्पूरतिलक ने पूछा, “कौन हो भाई तुम? कहाँ से आये हो? मैं तो तुम्हें नहीं जानता। मेरे पास किस काम सेआये हो?”
“महाराज! मैं एक भेड़िया हूँ। मुझे जंगल के सारे प्राणियों ने आपके पास भेजा है। जंगल का राजा ही सबकी देखभाल करता है, उसीसे जंगल की शान होती है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि अपने जंगल में कोई राजा ही नहीं।हम सब ने मिलकर सोचा कि आप जैसे बलवान को ही जंगल का राजा बनाना चाहिये। इसलिये राज्याभिषेक का मुहुर्त हमने निकाला है। यदि आपको कोई आपत्ति नहीं हो तो आप मेरे साथ चल सकते हैं और हमारे जंगल के राजा बन सकते हैं।
“ऐसी राजा बनने की बात सुनकर किसे खुशी नहीं होगी? कर्पूरतिलक भी खुश हो गया। अभी थोड़ी देर पहले तो मैं कुछ भी नहीं था और एकदम राजा बन जाऊँगा यह सोचकर उसने तुरन्त हामी भर दी। दोनो चल पडे। भेड़िया कहने लगा, “मुहुर्त का समय नज़दीक आ रहा है, जरा जल्दी चलना होगा हमें।”भेड़िया जोर जोर से भागने लगा और उसके पीछे कर्पूरतिलक भी जैसे बन पड़े, भागने की केाशिश में लगा रहा। बीच में एक तालाब आया। उस तालाब में ऊपर ऊपर तो पानी दिखता था। लेकिन नीचे काफी दलदल था। भेड़िया छोटा होने के कारण कूद कर तालाब को पार कर गया और पीछे मुड़कर देखने लगा कि कर्पूरतिलक कहाँ तक पहुँचा है।कर्पूरतिलक अपना भारी शरीर लेकर जैसे ही तालाब में जाने लगा तो दलदल में फंसताही चला गया। निकल न पाने के कारण  वह भेड़िये को आवाज़ लगा रहा था, “अरे! दोस्त, मुझे जरा मदद करोगे? मैं इस दलदल से निकल नहीं पा रहा हूँ।”लेकिन भेड़िये का ज़वाब तो अलग ही आया, “अरे! मूर्ख हाथी, मुझ जैसे भेड़िये पर तुमने यकीन तो किया लेकिन अब भुगतो और अपनी मौत की घड़ियाँ गिनते रहो, मैं तो चला!”यह कहकर भेड़िया खुशी से अपने साथियों को यह खुशखबरी देने के लिये दौड़ पड़ा।
बेचारा कर्पूरतिलक!
                             
  MORAL:      एकदमसे किसी पर यकीन ना करने में ही भलाई होती है।

मकड़ी का जाला -नैतिक कथा

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         एक मकड़ी थी. उसने आराम से रहने के लिए एक शानदार जाला बनाने का विचार किया और सोचा की इस जाले मे खूब कीड़ें, मक्खियाँ फसेंगी और मै उसे आहार बनाउंगी और मजे से रहूंगी .
      उसने कमरे के एक कोने को पसंद किया और वहाँ जाला बुनना शुरू किया. कुछ देर बाद आधा जाला बुन कर तैयार हो गया. यह देखकर वह मकड़ी काफी खुश हुई कि तभी अचानक उसकी नजर एक बिल्ली पर पड़ी जो उसे देखकर हँस रही थी.मकड़ी को गुस्सा आ गया और वह बिल्ली से बोली , ” हँस क्यो रही हो?
 “हँसू नही तो क्या करू.” , बिल्ली ने जवाब दिया , ” यहाँ मक्खियाँ नही है ये जगह तो बिलकुल साफ सुथरी है, यहाँ कौन आयेगा तेरे जाले मे.”ये बात मकड़ी के गले उतर गई. उसने अच्छी सलाह के लिये बिल्ली को धन्यवाद दिया और जाला अधूरा छोड़कर दूसरी जगह तलाश करने लगी.
      उसने ईधर ऊधर देखा. उसे एक खिड़की नजर आयी और फिर उसमे जाला बुनना शुरू किया कुछ देर तक वह जाला बुनती रही , तभी एक चिड़िया आयी और मकड़ी का मजाक उड़ाते हुए बोली , ” अरे मकड़ी , तू भी कितनी बेवकूफ है.”“क्यो ?”, मकड़ी ने पूछा.चिड़िया उसे समझाने लगी , ” अरे यहां तो खिड़की से तेज हवा आती है. यहा तो तू अपने जाले के साथ ही उड़ जायेगी.”मकड़ी को चिड़िया की बात ठीक लगीँ और वह वहाँ भी जाला अधूरा बना छोड़कर सोचने लगी अब कहाँ जाला बनायाँ जाये.
      समय काफी बीत चूका था और अब उसे भूख भी लगने लगी थी .अब उसेएक आलमारी का खुला दरवाजा दिखा और उसने उसी मे अपना जाला बुनना शुरू किया.
    कुछ जाला बुना ही था तभी उसे एक काक्रोच नजर आया जो जाले को अचरज भरे नजरो से देख रहा था.मकड़ी ने पूछा – ‘इस तरह क्यो देख रहे हो?’काक्रोच बोला-,” अरे यहाँ कहाँ जाला बुनने चली आयी ये तो बेकार की आलमारी है. अभी ये यहाँ पड़ी है कुछ दिनों बाद इसे बेच दिया जायेगा और तुम्हारी सारी मेहनत बेकार चली जायेगी. यह सुन कर मकड़ी ने वहां से हट जाना ही बेहतर समझा .
    बार-बार प्रयास करने से वह काफी थक चुकी थी और उसके अंदर जाला बुनने की ताकत ही नही बची थी. भूख की वजह से वह परेशान थी. उसे पछतावा हो रहा था कि अगर पहले ही जाला बुन लेती तो अच्छा रहता. पर अब वह कुछ नहीं कर सकती थी उसी हालत मे पड़ी रही.
  जब मकड़ी को लगा कि अब कुछ नहीं हो सकता है तो उसने पास से गुजर रही चींटी से मदद करने का आग्रह किया .चींटी बोली, ” मैं बहुत देर से तुम्हे देख रही थी , तुम बार- बार अपना काम शुरू करती और दूसरों के कहने पर उसे अधूरा छोड़ देती . और जो लोग ऐसा करते हैं , उनकी यही हालत होती है.” और ऐसा कहते हुए वह अपने रास्ते चली गई और मकड़ी पछताती हुई निढाल पड़ी रही.
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   MORAL:   हमारी ज़िन्दगी मे भी कई बार कुछ ऐसा ही होता है. हम कोई काम start करते है. शुरू -शुरू मे तो हम उस काम के लिये बड़े उत्साहित रहते है पर लोगो के comments की वजह से उत्साह कम होने लगता है और हम अपना काम बीच मे ही छोड़ देते है और जब बादमे पता चलता है कि हम अपने सफलता के कितने नजदीक थे तो बाद मे पछतावे के अलावा कुछ नही बचता.

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