कविता

माता-पिता का उपकार

हम कभी माता-पिता का ऋण चूका सकते नहीं .

उनके तो अहसां हैं इतने हम गिना सकते नहीं .

वो कहाँ पूजा में शक्ति , वो कहाँ फल जाप का ,

हो तो इनकी कृपा से , खात्मा संताप का .

इनकी तुलना में कोई वस्तु भी ला सकते नहीं .

हम कभी माता-पिता का ऋण चूका सकते नहीं .

देख लें हमको दु:खी तो, भर लें अपने नैन ये .

इक हमरे सुख के खातिर , तड़पते दिन-रेन ये .

भूख लगती न प्यास और नींद भी आती नहीं ,

हम कभी माता-पिता का ऋण चूका सकते नहीं .

पढ़ लो वेद और शास्त्र का भी , एक ये ही मर्म है .

योग्यतम संतान का , यस सबसे उत्तम कर्म है ,

जगत में जब तक रहें , सेवा करें माँ-बाप की ,

यह पथिक वह सत्य है , जिसको मिटा सकते नहीं .

हम कभी माता-पिता का ऋण चूका सकते नहीं .

उनके तो अहसां हैं इतने हम गिना सकते नहीं .

द्वारा :- अज्ञात कवि         प्रकाशक : अमन पाण्डेय

कक्षा :- १०

 

 

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